नमस्ते हरे कृष्णा, मेरा नाम ‘सारा परवीन’ है। अवश्य ही मैं अध्यात्म और धर्म का थोड़ा-बहुत ज्ञान रखती हूँ, पर मैं कोई बहुत बड़ी विद्वान नहीं हूँ। क्योंकि मैं तो वही सब ज्ञान सरल से सरल भाषा में समझाने का प्रयास कर रही हूँ जो मैंने महान वैष्णव संत गुरुदेव ‘श्रील प्रभुपाद जी' से सीखा है। श्रील प्रभुपाद ने इस्लाम, ईसाई, कुछ अज्ञानी हिन्दू सम्प्रदाय और लगभग हर मज़हब के अनेकों विद्वानों को अपने ज्ञान और तर्कों के द्वारा मात दी है। शायद ये मेरे कई जन्मों के पुण्य उदय होने का ही फल है, कि मुझे गुरु के रूप में श्रील प्रभुपाद जैसे महान भक्त प्राप्त हुए हैं। उनकी सहायता से ही मैं वास्तविक सनातन धर्म और परम ईश्वर श्रीकृष्ण की निष्काम भक्ति को समझ पाई हूँ। वैसे तो मेरा जन्म एक मुसलमान परिवार में हुआ था, लेकिन सौभाग्य से मैं इस्लाम को छोड़कर कृष्ण भक्ति का परम आनंद प्राप्त कर रहीं हूँ। क्योंकि सभी मज़हबी और आध्यात्मिक पुस्तकों को गहराई से पढ़ने और समझने के बाद मैं इस निष्कर्ष तक पहुंची हूँ, कि भगवान कृष्ण के कलयुग में भक्ति सिखाने के लिए हुए पूर्ण अवतार ‘चैतन्य महाप्रभु’ द्वारा बताया गया सिद्धांत ही पूर्ण रूप से उचित सिद्धांत है। हमारी संस्था ‘इस्कॉन’ चैतन्य महाप्रभु के सिद्धांत का पुरे विश्व में प्रचार करने के लिए ही प्रसिद्ध है। हम इस्कॉन के भक्त दिन-रात परम ईश्वर ‘कृष्ण’ की भक्ति का प्रचार करने में लगे रहते हैं। क्योंकि कृष्ण भक्ति के द्वारा ही मनुष्य को वास्तविक सुख या परम आनंद की प्राप्ति हो सकती है। आपके पास भले ही संसार की सारी भौतिक वस्तुएँ उपलब्ध हों, पर अगर आपमें कृष्ण भक्ति नहीं है, तो वो सारी वस्तुएँ मिलकर भी आपको आत्मशान्ति का अनुभव नहीं करवा सकतीं। इसके लिए हम सभी को वो कार्य अवश्य करना चाहिए जिससे हमारे गुरुदेव को प्रसन्नता हो। शुद्ध भक्ति का प्रचार करने से ही गुरुजन प्रसन्न होते हैं, उनकी संतुष्टि के लिए ही मैंने इस पुस्तक को प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक के द्वारा मैंने न सिर्फ ये समझाने का प्रयास किया है कि आखिर मैंने इस्लाम छोड़कर सनातन हिंदू धर्म के सिद्धांत को क्यों चुना, बल्कि इसमें मैं सनातन हिंदू धर्म का सिद्धांत भी ठीक से समझाने का प्रयास कर रही हूँ। मुसलमान परिवार में जन्म लेने के कारण मैं भी बचपन में इस्लाम को ही वास्तविक धर्म समझती थी। यहाँ तक कि मैं जहन्नुम (नरक) से इतना अधिक डरने लगी थी, कि सिर्फ लगभग 15 साल की उम्र में मैंने श्रृंगार करके बाहर निकलना तक छोड़ दिया था। मैं अक्सर अल्लाह (इस्लाम के ईश्वर) के द्वारा मरने के बाद मिलने वाला दण्ड और जन्नत (स्वर्ग) में मिलने वाले भोगों के विषय में ही सोचती रहती थी। ऐसे में मेरा जीवन एक प्रकार से नीरस होगया था, मैं बस धर्म और अध्यात्म का सच जानना चाहती थी। इसलिए मैंने हर विषय पर बिलकुल निष्पक्ष होकर अनुसन्धान किया है। और कृष्ण की कृपा से आज मैं वास्तव में सच जानती हूँ। मैं चाहती हूँ कि आप लोग भी सनातन हिन्दू धर्म को ठीक से समझो, क्योंकि अधिकांश सनातनी लोग अज्ञानता के कारण ही दूसरे पंथ या मज़हब के लोगों द्वारा मूर्ख बना दिये जाते हैं। कुछ लोगों के तो जीवन का उद्देश्य ही हिन्दुओं को धर्म से अलग करना होता है, लेकिन इसमें कोई बुराई भी नहीं है। क्योंकि जब तक सभी लोग अपने-अपने तर्कों को ठीक से पेश नहीं करेंगे, तब-तक सच सामने कैसे आ सकेगा? मेरे अनुसार अपने मज़हब या पंथ को सही साबित करने का प्रयास करना, और दूसरे लोगों को अपने धर्म से जोड़ने का प्रयास करने में कुछ भी बुरा नहीं है। पर अगर आप सिर्फ सामने वाले की अज्ञानता के कारण उनको मूर्ख बनाकर अपने मज़हब या पंथ से जोड़ोगे, तो ये अवश्य गलत है। अधिकतर दूसरे मज़हब का पालन करने वाले, और यहाँ तक कि हिन्दू लोग भी धर्म या अध्यात्म को ठीक से नहीं जानते हैं। इसलिए इस पुस्तक को अंत तक पढ़ें, और यथार्थ रूप में समझने का प्रयास करें। विशेषकर सनातनियों से मेरा विनम्र निवेदन है कि आप लोग धर्म और अध्यात्म को उचित प्रकार से समझो, तथा अज्ञानी लोगों को ठीक से उत्तर देने के योग्य हो जाओ। ताकि आपको और आपके सम्बंधियों को इस विषय में कभी कोई भ्रमित न कर सके। मेरा उद्देश्य आपको आध्यात्मिक बनाना है, न कि राजनैतिक। मैं इस पुस्तक की शुरुवात उन कारणों के विषय में बताने से करना चाहती हुँ, जिन्होंने मुझे इस्लाम छोड़कर सनातन हिन्दू धर्म क़ुबूल (स्वीकार) करने पर मजबूर कर दिया। उसके बाद हम सनातन धर्म क़े बारे में विस्तार से जानेंगे। हालांकि मैं इस्लाम को पूर्ण रूप से बहुत बुरा मज़हब बिलकुल नहीं कहती, मैं बस इसे एक सांकेतिक पंथ समझती हुँ। लगभग 3-4 साल पहले तक मैं इस्लाम मज़हब के प्रसिद्ध विद्वान मौलवी ‘ज़ाकिर नाइक’ को बहुत सुना करती थी। क्योंकि उनको सुनकर ऐसा लगता था जैसे वो कोई बहुत बड़े विद्वान् हैं। जब मैं ये देखती थी कि उनको इस्लाम के अलावा भी बाकी सभी मज़हबों की बहुत अधिक जानकारी प्राप्त है, तो मुझे उनमें विश्व का सबसे बड़ा विद्वान दिखाई देता था। जिस प्रकार से वो अन्य मज़हब के लोगों से इस्लाम क़ुबूल करवाते थे, वो बहुत रोचक था। आप ऐसा भी कह सकते हो कि मैं ज़ाकिर नाइक की बहुत बड़ी समर्थक थी। मुझे ऐसा लगता था कि उनसे हज़ारो लोग बहस करने और प्रश्न पूछने आते हैं, और ज़ाकिर उनको उत्तर देने में कभी विफल नहीं होते। हालांकि मैं हमेशा से इस्लाम के बहुत सारे नियमों को उचित नहीं मानती थी, लेकिन उसके बावजूद मैं इस्लाम को सबसे उत्तम सिद्धांत मानती थी। क्योंकि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। साथ ही तब अज्ञानी होने के कारण मैं जन्नत की लालच और जहन्नुम के डर से भी बंधी हुई थी। दरअसल पहले मैं भी ठेठ मुसलमान लोगों के जैसे गैर-मुसलमान लोगों को इस्लाम क़ुबूल करने के लिए कहती थी। और समझाने के लिए ज़ाकिर नाइक के बताये हुए दावे और तर्क ही बता दिया करती थी। इसमें रोचक बात ये थी कि लोग मेरे तर्कों के द्वारा संतुष्ट भी हो जाते थे, कुछ लोग तो अपना मज़हब छोड़कर इस्लाम क़ुबूल कर चुके थे। एक दिन मैंने इस्कॉन के एक भक्त को इस्लाम स्वीकार करने के लिए कहा, और कारण में मैंने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि इस्लाम के अंतिम पैग़म्बर मुहम्मद ही सनातन हिन्दू धर्म में बताये गए ‘कल्कि अवतार’ हैं। और इसलिए हिंदुओं को भी उनकी बताई हुई बात, यानी क़ुरान और हदीस का ही पालन करना चाहिए। क्योंकि ये बात मैंने ज़ाकिर नाइक के ही एक भाषण में सुनी थी। ये सुनकर उन्होंने मुझे इस विषय पर खुद से अनुसन्धान करने के लिए कहा। फिर अच्छे से इस विषय पर अनुसन्धान करने पर मुझे पता चला कि ये बात बिलकुल ही मूर्खों वाली बात है। क्योंकि पैगम्बर मुहम्मद साहब ने जो सिद्धांत बताए हैं, उनमें और मूल सनातन सिद्धान्त अर्थात् गीता के सिद्धांत में भूमि और आकाश जितना अंतर है। सच्चाई तो यही है कि आपमें भले ही आस्था या ईमान कूट-कूट के भरा हो, फिर भी आप सामान्य तौर पर इस्लाम के सभी नियमों का पालन तो कर ही नहीं सकते, और न ही करना चाहते हो। क्योंकि इस्लाम एक सांकेतिक मज़हब है। पूर्ण रूप से पालन करने योग्य नहीं है, बल्कि सिर्फ कुछ समय के लिए और कुछ अति असभ्य लोगों में सिर्फ थोड़ा सा सुधार करने के लिए ही इस्लाम आया था। और मूझे लगता है कि कोई भी समझदार मुसलमान मन से इस्लाम के सभी नियमों को उचित नहीं समझ सकता, पर इस्लाम को ही सही मानना उनकी मजबूरी है। इसका अर्थ ये बिलकुल भी नहीं है कि इस्लाम एक बहुत बुरा मज़हब है, दरअसल ये एक सांकेतिक मज़हब है। इस विषय में भी मैं आपको आगे चलकर ठीक से समझाऊंगी। इस्लाम में मान्यता है कि अल्लाह ने उनके आदेशों का पालन और प्रचार करने के लिए लगभग 124,000 पैगम्बरों को पृथ्वी पर भेजा था। लेकिन क़ुरान में सिर्फ 25 पैगम्बरों के नाम ही मिलते हैं। इस्लाम वास्तव में अब्राहमिक मज़हबों का ही एक भाग है। अगर आप क़ुरान को ठीक से पढ़ोगे तो उसमें आपको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 50% से 60% तक ईसाई धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक ‘बाइबिल’, और यहूदी धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक ‘तोराह’ की बातें ही मिलेंगी। पर इस्लाम में कहा जाता है कि मुहम्मद, जिनपर ‘जीबराइल’ नाम के एक फरिश्ते द्वारा क़ुरान की आयतें आती थीं, उन्होंने बताया कि वही अंतिम पैगम्बर हैं। उनके बाद कोई अन्य पैगम्बर नहीं आएगा। और उनके पहले वाले पैगम्बरों की बातें भी पूर्ण रूप से उचित नहीं थी। इसलिए सिर्फ इस्लाम का ही पालन किया जाना चाहिए। लेकिन वास्तव में मुहम्मद साहब को कल्कि अवतार कहना एक बहुत बड़ी मूर्खता से अधिक और कुछ नहीं है। क्योंकि सनातन शास्त्रों के अनुसार 43 लाख 20 हज़ार वर्षों का एक महायुग होता है, जिसमें 17 लाख 28 हज़ार वर्षों तक सतयुग, 12 लाख 96 हज़ार वर्षों तक त्रेतायुग, 8 लाख 64 हज़ार वर्षों तक द्वापरयुग और 4 लाख 32 हज़ार वर्षों तक कलियुग होता है। कलियुग को सबसे बुरा बताया गया है, पर सौभाग्य से इसकी अवधि सबसे कम है। भगवद गीता के अध्याय 4 श्लोक 6 से 8 में भगवान कृष्ण कहते हैं कि “मैं अपनी प्रकृति को अपने ही अधीन करके योगमाया से प्रकट होता हूँ। जब-जब धर्म पर अत्याचार होने लगते हैं और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं आता हूँ, बुरे लोगों का विनाश करने के लिए, अच्छे लोगों की रक्षा करने के लिए और धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए मैं खुद हर युग में प्रकट होता हूँ।” भागवत महापुराण में भगवान के कई अवतारों की बात करी गयी है। कुछ पूर्ण अवतार हैं जैसे श्रीराम और श्रीकृष्ण, वही कुछ सिर्फ भगवान के अंश या कलाएं हैं। कुल 6 प्रकार के अवतार होते हैं - पुरुष अवतार, लीला अवतार, गुण अवतार, मंन्वंतर अवतार, युग अवतार और शक्तयावेश अवतार। जिस प्रकार से इस्लाम और ईसाई मज़हब में पैगम्बरों की धारणा है, वैसे सनातन धर्म में भी कुछ ऐसे अवतार हैं जिन्हें पैग़म्बर कहा जा सकता है। विशेष तौर पर उन्हें ‘शक्तयावेश’ अवतार कहा जाता है। एक बार गुरुदेव श्रील प्रभुपाद ने मुहम्मद और ईसा मसीह को भी भगवान का शक्तयावेश अवतार कहा था। यानी वो ये कहना चाहते थे कि मुहम्मद और ईसा मसीह भी ईश्वर के भेजे हुए पैग़म्बर थे, जिनके साथ ईश्वर की शक्ति मौजूद थी। भले ही मुहम्मद और ईसा मसीह ने भगवद गीता के जैसे निष्काम कर्म और निष्काम भक्ति का सिद्धांत नहीं सिखाया, जो वास्तव में पूर्ण आध्यात्मिकता है। लेकिन उन्होंने बहुत ही बुरे समाज में एक अच्छा बदलाव करने का प्रयास अवश्य किया था। भागवत महापुराण के सकन्ध 12 अध्याय 2 श्लोक 18 में कलयुग के अंत में ‘कल्कि अवतार’ के प्रकट होने की बात करी गयी है। लेकिन इसका मतलब ये बिलकुल भी नहीं है कि कल्कि भगवान के अंतिम अवतार हैं, या फिर कलयुग में भगवान का सिर्फ कल्कि रूप में ही अवतार होगा। हमारे भगवान ‘सर्वशक्तिमान’ हैं, इसका अर्थ ये है कि वो कुछ भी कर सकने की क्षमता रखते हैं। इसलिए वो जब चाहें तब अवतार या विस्तार कर सकते हैं। जैसे वो कुछ सदियों पहले अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार 18 फरवरी 1486 को अपने ही भक्त ‘चैतन्य महाप्रभु’ के रूप में प्रकट हुए थे। जिसके प्रमाण भागवत महापुराण स्कंध 11 अध्याय 5 श्लोक 32 में अप्रत्यक्ष या सांकेतिक रूप में मिलते हैं। और गुलाब खान, तुलसीदास, मीरा जैसे भक्तों के लिए भी भगवान कई बार प्रकट हुए थे। किसी भी व्यक्ति की इतनी क्षमता नहीं है कि वो अपनी समझ के अनुसार भगवान के कार्यो को सुनिश्चित कर सके। इस समय कलियुग को शुरू हुए सिर्फ लगभग 5,000 वर्ष ही हुए हैं। जबकि शास्त्रों में स्पष्ट बताया गया है, कि कल्कि अवतार - कलियुग के बिल्कुल अंत में आएंगे। जिस समय गंगा नदी पूरी सूख चुकी होगी, 14-15 वर्ष की उम्र में ही लोग दादा-दादी और नाना-नानी बनने लगेंगे। सब्ज़ियां और फल उगना लगभग बंद हो चुके होंगे। आकाश से निरंतर तेज़ाब की वर्षा होने लगेंगी। और ऐसी कई सारी निशानियां बताई गई हैं, पर अभी इन निशानियोंके पूरा होने के दूर-दूर तक कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। ज़ाकिर नाइक जैसे मुर्ख मौलवी लोग मुहम्मद को कल्कि अवतार सिद्ध करने के लिए कई सारे कुतर्क भी देते हैं। जैसे वो कहते हैं कि — “हिन्दू शास्त्रों के अनुसार कल्कि अवतार के पिता का नाम ‘विष्णुयाश’ होगा। विष्णुयाश का अर्थ होता है ईश्वर का भक्त और अगर इस शब्द का हम अरबी भाषा में अनुवाद करेंगे, तो इसका अर्थ निकलेगा ‘अब्दुल्लाह’, और ये नाम मुहम्मद के पिता जी का था।” उस मुर्ख व्यक्ति ने अज्ञानता के कारण विष्णुयाश को अब्दुल्लाह बना दिया। लेकिन विष्णुयाश का वास्तविक अर्थ है भगवान ‘विष्णु की महिमा’। हाँ आप चाहो तो विष्णुयाश का एक अर्थ विष्णु का भक्त भी कह सकते हो। लेकिन ऐसे में अगर किसी का नाम ‘भगवान दास’ है तो क्या उसके बेटे को भी कल्कि अवतार मान लेना चाहिए? पर चलो इस मान्यता से उस बेचारे अज्ञानी मौलवी ने कम से कम ये तो स्वीकार कर लिया कि श्री विष्णु ही ईश्वर हैं। इसपर उसका दूसरा तर्क ये है कि — “कल्कि अवतार की माता का नाम ‘सुमति’ बताया गया है, जिसका अर्थ ‘शान्ति’ होता है। और मुहम्मद की माता का नाम भी ‘आमिना’ यानी शान्ति था।” इसी बात से आप ज़ाकिर नाइक की अज्ञानता का अनुमान लगा सकते हो, कि उसे ये भी नहीं पता कि सुमति का अर्थ शान्ति नहीं होता। सुमति का अर्थ ‘अच्छी मति’ या ‘अच्छी बुद्धि’ होता है। वैसे कुछ इसी प्रकार की बातें सिख धर्म का पालन करने वाले भी करते हैं। उन लोगों का कहना है कि सिख धर्म के दसवें गुरु, ‘श्री गोबिंद सिंह जी’ ही कल्कि अवतार हैं। और उनका तो नाम भी गोबिंद है, जो कि भगवान श्री कृष्ण के नाम ‘गोविन्द’ से बना है। साथ ही हिन्दू शास्त्रों में कल्कि अवतार के बारे में जो-जो गुण बताये गए हैं, गुरु गोबिंद सिंह जी में भी वो गुण दिखते हैं। पर हम लोग फिर भी गुरु गोबिंद सिंह जी को कल्कि अवतार नहीं मान सकते, फिर मुहम्मद को मानना तो बहुत दूर की ही बात है। क्योंकि शास्त्रों में साफ-साफ बताया गया है कि भगवान का कल्कि रूप में प्राकट्य कलियुग के अंत में होगा, जिसको अभी लगभग 4 लाख 25 हज़ार वर्ष बाकी हैं। निश्चित ही गुरु गोबिंद सिंह जी की शिक्षा भी भगवद गीता के ज्ञान के जैसी ही थी। इसलिए एक बार को हम उन्हें कल्कि अवतार मान भी लें, तो हमें कोई अधिक समस्या नहीं होगी। क्योंकि सिख धर्म बहुत तर्कशील और पूर्ण रूप से आध्यात्मिक है, इसमें भी निष्काम भक्ति और निष्काम कर्म का सिद्धांत सिखाया गया है। भगवद गीता और सिख धर्म में कोई विशेष अंतर नहीं है। हम लोग तो सिख धर्म को भी सनातन धर्म का ही भाग मानते हैं। पर मुहम्मद साहब के बताये सिद्धांत को देखकर उनको कल्कि अवतार मानना तो संभव नहीं है। साथ ही ज़ाकिर ये भी बताते हैं कि हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ ‘भविष्य पुराण’ के पर्व 3 खंड 3 अध्याय 3 में तो मुहम्मद का नाम तक लिखा हुआ है। जबकि भविष्य पुराण में मुहम्मद का कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन हाँ भविष्य पुराण के पर्व 3, खंड 3, अध्याय 3 में राजा भोज और एक ‘महामद’ नाम के राक्षस की कथा का उल्लेख अवश्य किया गया है। उसमें बताया गया है कि महामद नाम का एक विदेशी राक्षस था जिसने भगवान शंकर की पूजा करके उनसे शक्ति का वरदान प्राप्त किया, और फिर वो पूरे विश्व में अत्याचार करने लगा। यहाँ महामद राक्षस की बात हो रही है, लेकिन उसे मौलवी ज़ाकिर नायक पैग़म्बर मुहम्मद मान रहा है, तो इसमें हम क्या ही बोल सकते हैं? वो तो खुद मुसलमान होकर भी अपने पैग़म्बर मुहम्मद को भविष्य पुराण के द्वारा राक्षस साबित करने में लगे हैं। तो अब अगर कोई हिन्दू भविष्य पुराण पढ़कर ये बोलना शुरू कर दे, कि हमारे शास्त्रों में इस्लाम के आखरी पैग़म्बर मुहम्मद को राक्षस बताया गया है। तब आप उस व्यक्ति को दोष नहीं दे सकते, क्योंकि आप तो खुद ऐसा दावा कर रहे हो। सोचिये, कितने नीच होते हैं ऐसे मौलवी लोग जो सिर्फ खुद को और इस्लाम को सच्चा साबित करने के लिए इस प्रकार अजीब से झूठे तर्क देते हैं। उन्होंने मुहम्मद को महामद बनाकर राक्षस सिद्ध कर दिया, और आज भी उसके अन्धविश्वासी भक्त उन्हें सच्चा मानते हैं। ऐसे मुर्ख विद्वान दूसरे धर्मों की पुस्तकों में मुहम्मद से मिलता-झुलता नाम या चरित्र ढूंढ़कर ये सिद्ध करना चाहते हैं कि अन्य मज़हबों में भी मुहम्मद का उल्लेख है, ताकि अज्ञानी लोग इस्लाम की ओर आकर्षित हों। जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं होता, वो सिर्फ अंधों में काणा राजा बनते हैं, और मुर्ख तथा अज्ञानी लोगों को हमेशा भ्रमित करते रहते हैं। यही प्रमाण है कि अधिकांश अज्ञानी लोग सिर्फ सुनी-सुनाई या बनावटी बातों पर अकारण विश्वास कर रहे हैं। जबकि ऐसा बिलकुल भी नहीं करना चाहिए।