देवी-देवताओं की पूजा करना उचित तो है, पर ये भी जानना आवश्यक है कि पूजा और भक्ति में अंतर होता है। पूजा का अर्थ होता है आदर-सम्मान प्रकट करना, और भक्ति का अर्थ होता है कि हमने ये स्वीकार कर लिया है कि कोई एक विशेष व्यक्ति ही ‘परम भगवान' हैं और हम उनके भक्त, यानि उनके सिद्धांतों का पालन करने वाले हैं। किसी दूसरे देवी-देवता की पूजा करने का तात्पर्य उनको परम ईश्वर या एकमात्र ईश्वर मानना नहीं होता है। उसी प्रकार जैसे हम ‘नमस्ते’ कहते हैं। नमस्ते का अर्थ होता है कि “मैं आपको झुक कर प्रणाम करती हूँ।” इसका अर्थ ये नहीं होता कि मैं आपको ईश्वर मानती हूँ, बल्कि ये सिर्फ अहंकार के नाश के लिए कहा जाता है। पहले छोटे बच्चे बड़ों को नमस्ते कहते हैं, और बड़े भी उत्तर में छोटे बच्चों को नमस्ते कहते हैं। यानी इससे दोनों ही एक दूसरे के सामने विनम्र हो जाते हैं। ‘वन्दे मातरम्’ भी इसी प्रकार से कहा जाता है। वन्दे मातरम् का अर्थ होता है कि हम पृथ्वी की देवी ‘भूमि’ की स्तुति करते हैं, या उनकी पूजा करते हैं। वैसे ठीक से देखा जाए तो वन्दे मातरम् सम्पूर्ण पृथ्वी की देवी भूमि के लिए बोला जाना चाहिए, लेकिन अज्ञानता के कारण आजकल ये सिर्फ हमारे ‘भारत देश’ के लिए कहा जाता है। अज्ञानी मुसलमान मौलवी लोग अक्सर कहा करते हैं कि वन्दे मातरम् और नमस्ते कहना ‘शिर्क’ यानि इस्लाम का सबसे बड़ा अपराध है। क्योंकि इस्लाम के अनुसार सिर्फ अल्लाह के आगे झुकना चाहिए और सिर्फ अल्लाह की वंदना करनी चाहिए। अगर कोई ऐसा नहीं करता है तो उसे मरने के बाद हमेशा के लिए जहन्नुम का दण्ड सहना होगा। लेकिन वहीँ मौलवी लोग अक्सर ये भी कहा करते हैं कि इस्लाम के अनुसार ‘माँ के पैरों में जन्नत’ होती है। जबकि जन्नत में तो अल्लाह और मुहम्मद भी होंगे, तो क्या वो दोनों भी हमारी माँ के पैरों में हैं? फिर वो बताते हैं कि दरअसल इस बात का तात्पर्य सिर्फ माँ के विशेष व्यक्तित्व के प्रति सम्मान प्रकट करना, और उनका महत्त्व बताने से होता है। इसका अर्थ ये नहीं है कि हमारी माँ के पैरो में जन्नत, अल्लाह और पैग़म्बर हैं। बल्कि ये तो माँ की विशेषता बताने के लिए बोला जाता है। कई बार कहा कुछ और जाता है, समझा कुछ और जाता है, और उसका वास्तव में तात्पर्य कुछ और ही होता है। जैसे इस्लाम ने इस प्रकार से सिर्फ माँ के महत्त्व की बात करी है, वहीँ सनातन धर्म के अनुसार हमारे जीवन में संसार के सभी लोगों का बहुत बड़ा महत्त्व है। अगर किसान लोग सिर्फ थोड़ा सा धन लेकर हमारे लिए दिन रात श्रम न करें, तो जीवन कितना कठिन हो जायेगा? इसी प्रकार हमारे जीवन में हर देवता, हर मनुष्य, हर पद के व्यक्ति का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण योगदान होता है। इसलिए सबका सम्मान करना चाहिए, और अपने अहंकार का नाश करना चाहिए। खुद को विशेष न समझकर अन्य को विशेष समझना ही अहंकार का नाश है। अगर सभी मनुष्य अपने-अपने कार्यों को उचित प्रकार से न करें तो क्या संसार चल पायेगा? क्या बिना किसान के अन्न उग सकेगा? क्या बिना सैनिकों के सुरक्षा हो सकेगी? क्या बिना न्यायधीश के न्याय हो सकेगा? इसलिए भक्ति और समर्पण सिर्फ भगवान कृष्ण के प्रति होना चाहिए, पर अन्य लोगों को भी पूजा और सेवा के रूप में भरपूर सम्मान देना चाहिए। लेकिन मनोकामनाएं पूरी करवाने की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, न ही भगवान से और न किसी अन्य देवता से। देवता लोग मनोकामना पूरी कर सकते हैं या नहीं, ये प्रश्न ही व्यर्थ है। इसलिए इस विषय में मैं आपको कुछ विस्तार से नहीं बताउंगी। क्योंकि जो चीज़ चर्चा करने योग्य ही नहीं है, उसके बारे में गहन विचार करने का क्या लाभ? भगवद गीता अध्याय 7 श्लोक 23 में भगवान कृष्ण कहते हैं कि दूसरे देवी-देवताओं से मिलने वाला फल नाशवान है, यानी बस कुछ समय के लिए ही लाभ देता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भौतिक वस्तु कभी आत्मसंतुष्टि और आत्मशान्ति का कारण नहीं बन सकती। यही कारण है कि मैं आपको ये भौतिक मनोकामना और भौतिकता की प्रार्थना वाले विषय नहीं समझाना चाहती। वैसे तो आपने अक्सर यही सुना होगा कि कृष्ण - विष्णु के अवतार हैं, पर दरअसल ऐसी मान्यता अज्ञानता के कारण है। जब हम इस्कॉन संस्था वाले कहते हैं कि कृष्ण ही परम ईश्वर हैं और सभी अवतारों तथा विस्तारों का स्रोत हैं, तो इससे कई अन्य सम्प्रदाय के लोगों को आपत्ति होती है। क्योंकि अधिकांश लोग यही सोचते हैं कि कृष्ण तो खुद श्रीविष्णु के अवतार हैं। वैसे कृष्ण और विष्णु में कोई अंतर नहीं है, पर कृष्ण - विष्णु के अवतार नहीं, बल्कि श्रीविष्णु कृष्ण के विस्तार स्वरुप हैं। हिन्दू धर्म की सबसे पवित्र और अंतिम पुस्तक ‘भागवत महापुराण’ जिसे ‘भागवतम्’ भी कहा जाता है, उसके पहले स्कंध, अध्याय 3 श्लोक 28 में भी ये कहा गया है - “सारे अवतार या तो भगवान के पूर्ण अंश हैं या कलाएं हैं, पर श्रीकृष्ण तो आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ही हैं।” इसके अलावा अन्य पुस्तक ब्रह्मसंहिता 5.1 में इस ब्रह्मांड के रचयता ‘ब्रह्मा’ कहते हैं कि - “कृष्ण जिन्हें गोविंद के नाम से जाना जाता है। उनसे प्राचीन या बड़ा कोई नहीं है और वो सभी कारणों के कारण हैं।” लेकिन अधिकांश लोगों की मान्यता ऐसी इसलिए है कि कृष्ण - विष्णु के अवतार हैं? क्योंकि भागवतम् के 10वे स्कंध के पहले अध्याय में कुछ इस प्रकार से ही बताया गया है। लेकिन उसके बाद वाली कथा हमें हिन्दू धर्म की एक दूसरी पुस्तक ‘गर्ग संहिता’ में मिलती है। गर्ग संहिता के गोलोक खंड में खुद भगवान विष्णु देवताओं को ये बताते हैं, कि सभी अवतारों या विस्तारों के वास्तविक स्रोत तो भगवान श्री कृष्ण हैं। इसका अर्थ ये बिल्कुल भी नहीं है कि भगवान कृष्ण और विष्णु में कुछ अंतर है, ये दोनों एक ही तत्व कहे जाते हैं। विष्णु, महाविष्णु आदि ये सब कृष्ण के ही विस्तार हैं। सरल भाषा में कहें तो कृष्ण इन सभी रूपों में एक साथ उपस्थित हैं। ये विषय समझाने के लिए इस्कॉन के संस्थापक गुरुदेव श्रील प्रभुपाद बताते हैं, कि जैसे गिरगिट अपनी आंखें 360 डिग्री तक भी घुमा सकता है, जबकि हम मनुष्य लोग 120 डिग्री भी सरलता से नहीं देख पाते, तथा ऑक्टोपस के पास 8 भुजाएं होती हैं, जिसे आवश्यकता पड़ने पर वो पैरों में भी बदल सकता है। जबकि हम लोग इस प्रकार का कुछ सोच भी नहीं सकते, इसलिए हमें ये असंभव सा ही लगेगा। पर क्योंकि हमें ये असंभव लगता है, इससे ये वास्तव में असंभव नहीं हो जायेगा। भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं, उनके लिए कुछ भी करना असंभव नहीं हो सकता। किसी भी कार्य को ईश्वर के लिए असंभव कहना बहुत बड़ी मूर्खता है। हिन्दू धर्म में बहुत सारे देवी देवताओं का उल्लेख किया गया है, कुछ लोग 33 करोड़ देवी देवताओं की संकल्पना को भी सच मानते हैं। हालांकि करोड़ों देवी-देवता होना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि प्रत्येक प्राकृतिक वस्तु पर अलग-अलग देवी-देवताओं का राज होता है। 33 करोड़ ही नहीं, ये आंकड़ा इससे कई गुना अधिक भी हो सकता है। और कई सम्प्रदाय के लोग इस विषय को ऐसे भी बताते हैं कि वेदों में 33 कोटि देवताओं की बात कही गयी है, पर उनके अनुसार वेदों में कोटि शब्द का अर्थ करोड़ नहीं बल्कि प्रकार है। इनमें आठ वसु हैं, ग्यारह रुद्र हैं, बारह आदित्य हैं और दो अश्विनी कुमार हैं। कहा जाता है कि ये देवता अधिकतर भौतिक जगत यानी पृथ्वी, स्वर्ग जैसे ग्रहों को संचालित रखते हैं। लेकिन मैं इस 33 प्रकार के देवताओं वाली धारणा से सहमत नहीं हूँ। क्योंकि वास्तव में देवी-देवताओं की संख्या करोड़ों-अरबों में है। तो देवी-देवता करोड़ो-अरबों की संख्या में होते हैं, और उन सभी को शक्ति कृष्ण के द्वारा ही प्राप्त होती है, लेकिन परम ईश्वर सिर्फ एक श्रीकृष्ण को ही कहा जाना चाहिए।