कई हिंदुओं के अनुसार ही ईश्वर निराकार हैं, यानी ईश्वर की कोई प्रतिमा या रूप नहीं है। वेदों में भी ये कहा गया है कि ईश्वर की कोई प्रतिमा नहीं है। जैसे यजुर्वेद भाग 32 मंत्र 3 में कहा गया है कि “जिस परमात्मा की महिमा का वर्णन हिरण्यगर्भः यस्मान्न जात: तथा मा मा हिंसात' आदि मंत्रों में किया गया है, जिसका नाम और यश बहुत बड़ा है, लेकिन उसकी कोई प्रतिमा नहीं है।” यहाँ स्पष्ट रूप से कहा जा रहा है कि परमात्मा की कोई प्रतिमा नहीं है। इसलिए इस मंत्र को पढ़ने वाले लोग अक्सर उलझ जाते हैं। पर वास्तव में ये मंत्र भी कृष्ण के लिए ही कहा गया है। भगवद गीता के अध्याय 11 में अर्जुन भगवान कृष्ण से कहते हैं कि वो भगवान का विश्वरूप देखना चाहते हैं और उन्हें भगवान अपना विश्वरूप दिखा भी देते हैं। उस रूप में एक साथ ही पूरा ब्रह्मांड दिख रहा था। स्वर्ग, नरक, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म, हज़ारों-लाखों हाथ पैर, मुँह, पेट, आंखें, सारे देवी-देवता, देवदूत, यमदूत, भूत, वर्तमान, भविष्य। शिव, ब्रह्मा, यानी विश्व में जो कुछ भी मौजूद है, सबकुछ भगवान के विराट विश्व रूप में एक ही स्थान पर दिख रहा था। और इसी विश्व रूप को ही वेदों में निराकार ब्रह्म या परमात्मा कहा गया है, क्योंकि इस रूप की कोई सीमित प्रतिमा नहीं है। विराट रूप को ‘काल’ भी कहा जाता है और काल का अर्थ होता है ‘समय’, जिसके संचालनकर्ता शिवजी हैं। यजुर्वेद 32.3 के अगले मंत्र, मंत्र 4 में ऐसा ही स्पष्ट बताया गया है। इसमें कहा गया है क़ि “परमात्मा अकेले ही सभी भुवनों में उपस्थित हैं, उनसे पहले कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ, वो प्रजा के साथ रहने वाले प्रजापति सोलह कलाओं से युक्त तीनों ज्योतियों को धारण करते हैं।” और शायद आप जानते ही होंगे कि सोलह कलाओं से युक्त कृष्ण को ही कहा जाता है। अब निराकार ईश्वर की बात हो रही है तो मैं आपकी जानकारी के लिए, इस्लाम में ईश्वर की धारणा को भी थोड़ा स्पष्ट कर देना चाहती हूँ। सामान्य मुसलमान लोग ये मानते हैं कि अल्लाह निराकार है, लेकिन इस्लाम में निराकार ईश्वर जैसा कोई विषय ही नहीं है। ऐसी एक भी आयत या हदीस नहीं है, जो ये साबित करती हो कि अल्लाह का कोई रूप नहीं है। अगर आप इस्लाम को ठीक प्रकार से ढोंगी मौलवीयों की बातों से लगे अंधविश्वास के चक्षु हटाकर पढ़ोगे तो जान पाओगे, कि इस्लाम में ईश्वर यानी अल्लाह की प्रतिमा है। उदाहरण के लिए क़ुरान सुरह 20 आयत 5 में कहा गया है कि “अल्लाह कुर्सी पर बैठे हैं”। जो कुर्सी पर हैं, वो निराकार कैसे हो सकते हैं? निराकार कुर्सी पर सिमित कैसे हो सकते हैं? यही बात सुरह 10 आयत 3, और कई अन्य जगहों पर भी कही गयी है। सुरह 39 आयत 67 में कहा गया है कि प्रलय के दिन आकाश अल्लाह के दाहिने हाथ में लिपटे होंगे। मौलानाओं के अनुसार ये सिर्फ रूपक या मैटाफॉर है। रूपक उसे कहते हैं जो बात सिर्फ सरल भाषा में समझाने के लिए कही जाती है। तो चलो फिर मैं आपको कुछ अन्य उदाहरण देती हूँ, जिसे मौलाना लोग भ्रमित करने के लिए रूपक भी नहीं कह सकते। पुस्तक ‘साहीह मुस्लिम’ की हदीस 2612e में मुहम्मद कहते हैं कि “कोई भी जब अपने भाई से लड़े तो चेहरे का बचाव करें। क्योंकि आदम (जो कि विश्व के सबसे पहले मनुष्य हैं ईसाइयत और इस्लाम आदि अब्राहमिक मज़हबों के अनुसार) को अल्लाह ने अपने खुद के जैसा दिखने वाला बनाया है।” इस हदीस को आप किसी भी प्रकार से रूपक साबित नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें चेहरे शब्द का भी स्पष्ट प्रयोग हुआ है। पुस्तक ‘मिश्क़त अल मसाबीह’ की हदीस 748 में तो अल्लाह के हाथ और उंगलियों तक के बारे में साफ-साफ बताया गया है। और ऐसी बहुत सारी दूसरी आयतें और हदीस भी मौजूद हैं, जो ये साबित करती हैं कि अल्लाह निराकार नहीं हैं। वो बात अलग है कि मुसलमान लोग अज्ञानता और समझ में कमी होने के कारण, साकार को ही निराकार समझ रहे हैं। जिस प्रकार हम अपने माता-पिता के जैसे दिखते हैं, उसी प्रकार ईश्वर मनुष्य जैसे नहीं, बल्कि मनुष्य अकार में थोड़े से ईश्वर जैसे दिखते हैं। हालांकि कृष्ण का रूप तो दिव्य है उनके जैसा कोई नहीं हो सकता, यहाँ मैं मनुष्य रूप के आकार की बात कर रही हूँ। सनातन धर्म में ईश्वर या कृष्ण के जिस निराकार रूप के बारे में बताया गया है, उसका ध्यान और पूजा करना भी अनुचित नहीं है। पर भगवान ने भगवद गीता के 12वे अध्याय की शुरुवात में, भक्ति के लिए अपने निराकार रूप से अधिक साकार रूप को उत्तम बताया है। इसका कारण ये है कि जो भगवान के सिर्फ और सिर्फ निराकार रूप की भक्ति करेगा, वो वास्तव में भक्ति कर ही नहीं पायेगा। क्योंकि किसी की भक्ति करने के लिए गुणों और कथाओं की आवश्यकता भी होती है, बिना गुण और कथा वाले की भक्ति करना तो मूर्खता है। जब किसी में गुण होंगे ही नहीं तो उसकी भक्ति हम कैसे कर सकते हैं? इसलिए भगवान के सिर्फ निराकार रूप की भक्ति करना भी नासमझी ही है। क्योंकि निराकार होना और निर्गुण होना भी भगवान के अनंत गुणों में ही शामिल हैं। मूर्तिपूजा ठीक नहीं है! पर जो व्यक्ति ‘विग्रह सेवा' को ठीक से समझ जाएगा तो वो मूर्तिपूजा और विग्रह सेवा में साफ-साफ अंतर देख पायेगा। जिस व्यक्ति को मूर्ति दिखती है वो असल में भक्ति नहीं करता, और जो वास्तव में भक्ति करता है उसे कृष्ण के सिवा कोई नहीं दिखता। शिव भी कृष्ण के ही विस्तार स्वरुप हैं, कृष्ण और शिव में कोई अंतर नहीं। एक प्रकार से भगवान कृष्ण के काल या विराट विश्व रूप को ही शिवलिंग कहा जाता है। शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग शिव के निराकार रूप का प्रतीक है। ऐसा अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ का मानना भी है, कि इस ब्रह्माण्ड का आकर थोड़ा शिवलिंग के जैसा है। शिवलिंग का ऊपर वाला भाग ब्रह्माण्ड का आकर है, और निचे से शिवलिंग एक दिये या दीपक के जैसा होता है। इसलिए जब आप शिवलिंग को ध्यान से देखोगे, तो आपको वो ‘ज्योत’ जैसा लगेगा। शिवलिंग को आप अज्ञानता और भ्रम मिटाने की ज्योत या चिराग भी कह सकते हो।