कुछ हिन्दू सम्प्रदाय के लोगों की मान्यता के अनुसार ही विग्रह सेवा करना अनुचित है। क्योंकि उनका कहना है कि हर मूर्ति तो बिल्कुल कृष्ण के जैसे नहीं दिख सकती। तो इसपर मेरा उत्तर यही रहेगा कि जब कृष्ण ने खुद कह दिया कि जिस स्थान पर भी मेरा स्मरण करके विग्रह बनाया जाता है, भले ही वो किसी भी प्रकार का हो, लेकिन वो मैं ही हूँ - ऐसा मानना चाहिए। तो फिर संदेह किस बात का? और वैसे भी शास्त्रों में कृष्ण के रूप के विषय में विस्तार से बताया गया है। आठ प्रकार की धातुओं में से किसी एक से भगवान के विग्रह को बनाया जाता है। फिर उनकी पूजा करके ये सिद्ध किया जाता है कि वो कोई मूर्ति नहीं बल्कि भगवान ही-हैं। क्योंकि भगवान तो भक्त के लिए हर स्थान पर उपस्थित रहने के लिए तैयार हैं। सिर्फ हमारी भौतिक आंखों से उन्हें देखा नहीं जा सकता है, क्योंकि हम अभी भक्ति में उतने विकसित नहीं हुए हैं। भगवान के दर्शन करने के लिए हमें भौतिक आंखों को पूर्ण रूप से छोड़ना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि कलियुग में भगवान के दर्शन बिलकुल ही नहीं होते हैं। हालांकि हमारी आँखें इस योग्य तो नहीं हैं कि हम भगवान को देख पाएं, क्योंकि हम लोग ‘काम’ यानि ‘हवस’, ‘क्रोध’ यानी ‘गुस्सा’, ‘लोभ’ यानि ‘लालच’ और ‘मोह’ यानी ‘अतिआसक्ति’ आदि जैसे विकारों से भरे हुए हैं। लेकिन जब हम भगवान की पूजा करने के स्थान पर भक्ति करने लगेंगे, और कर्तव्य मानकर आरती, जप और साधना करने के स्थान पर अगर हम ह्रदय से सिर्फ उनके दर्शन मांगने लगेंगे। हमेशा रो-रोकर भगवान से कहने लगेंगे कि हे कृष्ण हमें सिर्फ और सिर्फ आपका दर्शन तथा प्रेम चाहिए, और संसार में कुछ भी नहीं चाहिए हमें आपके दर्शन और प्रेम के सिवा। तो इतना ध्यान रखो कि भगवान चाहें तो कभी भी आपको दिव्य नेत्र देकर, अपने दिव्य स्वरुप के दर्शन करवा सकते हैं। जैसे एक बार गर्ग संहिता के अनुसार भगवान कृष्ण के विस्तार स्वरुप श्रीविष्णु, देवताओं को लेकर अपने वैकुंठ धाम से गोलोक वृन्दावन की ओर गए। गोलोक के पास पहुँचते ही उन्हें एक तेज यानी प्रकाश दिखाई दिया। स्वर्ग के देवता लोग भी उस तेज को सहन नहीं कर पाए और उनकी आँखें चौंधिया गयी। जब वो दृश्य देखकर देवताओं की हालत बहुत बिगड़ने लगी, तो उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना करी और स्तुति करके भगवान को प्रसन्न किया। तब भगवान ने उनको दिव्य दृष्टि दी, जिससे वो गोलोक के दर्शन कर पाएं। यानी देवताओं की भी इतनी क्षमता नहीं है कि वो खुद की इच्छा से भगवान या भगवान के धाम के दर्शन कर पाएं। पर अगर भगवान चाहें तो कुछ भी हो सकता है। जैसे भगवद गीता अध्याय 11 में अर्जुन ने भगवान के विराट विश्वरूप के दर्शन करने चाहे, तो भगवान ने कहा कि “तू उसे अपनी इन भौतिक आँखों से नहीं देख सकता, इसलिए मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ।” क़ुरान के अनुसार एक बार पैग़म्बर ‘मूसा’ ने भी अल्लाह से उनके दर्शन करने की इच्छा करी थी। मान्यता है कि अल्लाह ने मूसा के लिए अपना रूप एक पहाड़ के ऊपर दिखाया था। मूसा ने जैसे ही उस पहाड़ को देखा तो वो बेहोश हो गए। ऐसा इसलिए क्योंकि शायद वह मूसा को दर्शन करवाना ही नहीं चाहते थे। क्योंकि जिस ईश्वर ने ये पूरा विश्व बनाया है, उसके पास कुछ भी कर सकने की क्षमता है। तो ये कहना बिलकुल अनुचित है कि ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य हुआ। ईश्वर चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं, जैसे भगवद गीता अध्याय 11 में कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य नेत्र देकर अपना विश्वरुप दिखाया था। इसके लिए मैं आपको ‘धन्ना भगत’ नमक व्यक्ति की कथा से एक और उदाहरण देती हूँ। धन्ना भगत को एक दिन एक साधु ने ‘शालिग्राम’ दे दिया और कहा कि ये भगवान हैं — इनकी भक्ति करना। धन्ना सीधी-सादी बुद्धि वाले थे, उन्होंने सच में मान लिया कि शालीग्राम पत्थर वास्तव में भगवान ही हैं। वो प्रतिदिन शालिग्राम को थाली में रोटी, दाल, दूध रखकर बड़े प्रेम से खिलाने का प्रयास करते थे, लेकिन कई दिनों तक भोजन जैसे-का-तैसे पड़ा रहता था। एक दिन धन्ना रुआँसे होकर बोले—“हे ठाकुर, अगर आप मेरे प्रेम की लाज नहीं रखोगे, तो मैं भी भोजन नहीं करूँगा।” उनकी भक्ति और सहजता देखकर भगवान का हृदय पिघल गया। उसी क्षण तेज प्रकाश हुआ और शालिग्राम से स्वयं भगवान प्रकट हो गए। उन्होंने धन्ना द्वारा परोसा भोजन स्वीकार किया। उस दिन धन्ना भगत धन्य हो गए—क्योंकि उनकी शुद्ध और सरल भक्ति ने स्वयं भगवान को प्रकट होने पर मजबूर कर दिया। इसलिए जब तक आप ये सोचोगे कि विग्रह सिर्फ एक पत्थर है, तब तक आपको कोई अनुभव नहीं होगा। लेकिन जब आप दृढ़ विश्वास रखोगे कि ये विग्रह कोई पत्थर नहीं बल्कि साक्षात् ठाकुरजी हैं, तो आपको विग्रह दिव्य अनुभव और दर्शन अवश्य करवाएंगे। जिन्हें दर्शन होते हैं वो खुद कभी नहीं बताते इस बारे में। दर्शन होने पर भी इस विषय को हमेशा गुप्त रखा जाता है। चाहे दर्शन सपने में हों या वास्तव में, किसी को भी उसके बारे में नहीं बताना चाहिए। क्योंकि इस विषय को बताने से अहंकार में वृद्धि होती है। लेकिन जिस भक्त को देखते ही आपका मन भक्तिमय होजाये। जिस व्यक्ति के दर्शन करके अद्भुत संतुष्टि का अनुभव होने लगे, समझ लेना कि वो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। और शायद ऐसे व्यक्ति को वास्तव में भगवान के दर्शन प्राप्त हुए हैं। एक भक्त के लिए सबसे अधिक आनंद की बात यही होती है कि भगवान उसकी सेवा को स्वीकार करें। भगवान की सेवा में और लीलाओं में भाग लेने के लिए ही कई भक्त निरंतर घोर तपस्या करते हैं। जब हम भगवान को भोग लगाते हैं तो भगवान उस भोग को स्वीकार करते हैं, हमारे लिए यही सबसे ऊँचे स्तर की प्रसन्नता है। कई लोगों को विग्रह सेवा के द्वारा भगवान के दर्शन, भोजन का ‘भोग’ लगाते समय ही प्राप्त होते है। इसपर कई बुद्धिजीवीयों का प्रश्न ये भी होता है कि भगवान को खाने का भोग लगाने की क्या आवश्यकता है? हम पूरे विश्व के स्वामी भगवान कृष्ण की मूर्ति या विग्रह के आगे खाना रख देते हैं, तो ऐसी भक्ति से क्या लाभ? इसका उत्तर है कि — आप भक्ति में लाभ शब्द को जोड़कर भक्ति शब्द को दूषित कर रहे हो। भक्ति में लाभ या हानि नहीं, सिर्फ और सिर्फ भक्ति होती है। भगवान कृष्ण को खाने की तो कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन प्रेम की आवश्यकता है। कृष्ण हमारे लिए सबसे विशेष व्यक्ति हैं, भक्त के लिए सबसे अधिक आवश्यक भगवान हैं। हाँ! माता-पिता और गुरु का दर्जा भी भगवान जितना बड़ा और महान ही है, लेकिन वास्तव में वो लोग भी तो कृष्ण के ही अंश हैं। कृष्ण हमारे स्वामी तो हैं, पर वो हमारे सबसे विशेष संबंधी भी हैं। उनके साथ हमारा जैसा संबंध है वैसा किसी भी अन्य के साथ नहीं है। यही सोचकर घर का सबसे विशेष सदस्य जानकर उनके विग्रह के आगे सबसे पहले उनको ही भोग लगाया जाता है। हम लोग नृत्य क्यों करते हैं? क्या नृत्य करना आवश्यक होता है? नहीं! बस आनंद के लिए करते हैं। ऐसे ही भोजन भोग आदि के द्वारा भगवान की विग्रह सेवा करने में शुद्ध भक्त को आनंद आता है। हर कार्य सिर्फ आवश्यकता के लिए ही नहीं होता। भगवान को भोग लगाने से वो भोजन ‘प्रसाद' बन जाता है, और सच्चे दिल से जिस भोजन को विग्रह के आगे भोग लगाया जाता है, उस प्रसाद को खाने वाले व्यक्ति के विचार भी अपने आप ही शुद्ध होने लगते हैं। पर विग्रह सेवा के रहस्य को समझना, प्रेम तत्व के रहस्य को समझे बिना असंभव है। दूसरे देवी-देवताओं की विग्रह सेवा भी कुछ हद तक उचित तो है, लेकिन ध्यान रखें कि कृष्ण यानी विष्णु तत्व या शिव तत्व के सिवा कोई भी हर स्थान पर एक साथ उपस्थित रहने में समर्थ नहीं है। बाकी देवी-देवता अपने करोड़ो विग्रहों की पूजाओं को एक साथ देख अवश्य सकते हैं, पर वहाँ उपस्थित नहीं होते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भगवान के विग्रह खाना तो खाते ही नहीं हैं, फिर वो भोग कैसे लगा? उनसे मेरा ये प्रश्न है कि — आपको कैसे पता कि विग्रह भोग लगाते हैं या नहीं? क्या आपने कभी शुद्ध भक्ति के साथ ये अभ्यास किया है? “कौन कहता है कि भगवान खाते नहीं, हम बेर शबरी के जैसे खिलाते नहीं”, बस यही अंतर है। जिनके मन में शुद्ध कृष्ण भक्ति मौजूद ही नहीं है, जिनमें सिर्फ नाम और दिखावे के लिए ही कृष्ण भक्ति है, उनके भोजन को ठाकुरजी भोग क्यों लगाएंगे? भगवान अवश्य खाते हैं, लेकिन पहले उनको खिलाने वाले तो बनो, उसके लिए मन में वास्तविक शुद्ध प्रेम तत्व को तो जागृत करो। विग्रह सेवा के रहस्य की गुत्थी कोई और नहीं सुलझा सकता, उसे सिर्फ प्रेम के रस में डूबकर आप खुद ही सुलझा सकते हो। ह्रदय में कृष्ण प्रेम को बढ़ाने के लिए आपको निरंतर नाम जप करना चाहिए, कृष्ण की कथाओं का श्रवण करना चाहिए, कृष्ण के भजनों पर नृत्य करना चाहिए, और उनका गुणगान करना चाहिए।