सनातन धर्म में वास्तविक परम ईश्वर ‘कृष्ण’ को बताया गया है। वैसे तो हिन्दू धर्म में कई सारे सम्प्रदाय हैं जैसे - शैव, वैष्णव, आर्य समाज, अद्वैतवाद आदि। शैव लोग ‘शिवजी’ को परम ईश्वर यानी वास्तविक भगवान मानते हैं। वैष्णव लोग ‘विष्णु’ या ‘राम तथा कृष्ण’ को परम ईश्वर मानते हैं। आर्य समाज वाले सर्व्यापी ‘ॐकार’ को परम ईश्वर मानते हैं। वहीँ अद्वैतवादी (मायावादी) लोग तो एक प्रकार से नास्तिक ही होते हैं। पर सच्चाई ये है कि सनातन हिन्दू धर्म में कृष्ण ही परम ईश्वर हैं। उनके अलावा किसी को भी परम भगवान मानना कोई पाप तो नहीं है, पर मूर्खता अवश्य है। जिस प्रकार किसी भी व्यक्ति के बहुत सारे पिता नहीं हो सकते, उसी प्रकार परम भगवान भी बहुत सारे नहीं हो सकते, ऐसा मेरा मानना है। हालांकि कोई शिव की पूजा करता है, कोई माता दुर्गा की पूजा करता है, तो कोई अन्य देवी-देवताओं की पूजा करता है। और हर कोई यही कहता है कि हमारे भगवान ही वास्तविक हैं। वैसे तो शिवशक्ति यानी शिव और माता दुर्गा की पूजा करना गलत नहीं है। हमें शिव तत्व में और कृष्ण तत्व में अंतर नहीं समझना चाहिए, क्योंकि शिव भी कृष्ण के ही विस्तार स्वरुप हैं। लेकिन किसी भी देवी-देवता को ईश्वर मान लेना, ये अज्ञानता के कारणसे होता है। हिन्दू धर्म में कई सारे सम्प्रदाय हैं जैसे इस्लाम में शिया, सुन्नी, बरेलवी आदि होते हैं। ईसाइयत में कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स, प्रोटेस्टेंट आदि होते हैं, उसी प्रकार हमारे में - शैव, वैष्णव, आर्य समाज, अद्वैतवाद आदि, ये सारे सम्प्रदाय होते हैं। हो सकता है ये बात आप पहली बार ही सुन रहे हों, कि हिन्दू धर्म में सिर्फ एक ही भगवान हैं। क्योंकि विश्व के अधिकतर लोगों की मान्यता ये है कि हिन्दू लोग 33 करोड़ देवी-देवताओं को भगवान मानते हैं। हालांकि इसका अर्थ ये नहीं है कि जो लोग दूसरे देवी-देवताओं को भगवान मानते हैं, उनको हम वैष्णव लोग पापी या बुरा मानते हैं। क्योंकि शास्त्रार्थ में हमारा मतभेद हो सकता है, पर मनभेद नहीं हो सकता। क्योंकि देखा जाए तो दूसरे देवी-देवताओं की पूजा भी इसलिए करी जाती है, क्योंकि उन देवी-देवताओं को शास्त्रों में ही महान बताया गया है। पर ये विषय जानने के लिए सबसे पहले आपको देवी-देवताओं और भगवान में अंतर समझना चाहिए। देवी-देवता एक पद या दर्जा है, जिस प्रकार से किसी कंपनी में कोई सी.ई.ओ होता है, कोई सी.ऐफ.ओ होता है, तो कोई मैनेजर होता है। उसी प्रकार से इस विश्व में उपस्थित सभी प्राकृतिक वस्तुओं पर भगवान ने देवी-देवताओं को अधिकार दिया है। यहाँ तक कि अगर आप खुद भी ये संकल्प कर लो कि मुझे देवी-देवताओं का पद प्राप्त करना है, तो कुछ जन्मों की तपस्या के प्रयास के बाद आपको भी ये पद मिल सकता है। ये पद प्राप्त करने के बाद देवी-देवताओं को बहुत सम्मान मिलता है, और मिलना भी चाहिए क्योंकि इसके लिए उन्होंने बहुत श्रम किया होता है। कुछ लोग देवी देवताओं को फ़रिश्ते समझते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। देवी-देवता एक अलग प्रकार का दर्जा है। फरिश्तों को आप देवदूत कह सकते हो, यानी देवी-देवताओं के सेवक। पर इस्लाम में ऐसा नहीं है, मुसलमानों के ईश्वर ‘अल्लाह’ ने तो किसी भी दूसरे की पूजा करने की अनुमति नहीं दी है। उनमें कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति दूसरे देवी-देवताओं की पूजा करता है, उसे जहन्नुम में डाल दिया जाता है और बहुत भयंकर दण्ड दिया जाता है। तो जो लोग इस बात को सच मानते हैं, उनसे मैं ये पूछना चाहती हुँ, कि क्या आपके अनुसार ईश्वर समझदार और दयावान हैं या फिर मुर्ख, घमंडी और क्रूर हैं? इसपर अवश्य ही सब कहेंगे कि ईश्वर मुर्ख, घमंडी और क्रूर कैसे हो सकते हैं? क्योंकि हर मज़हब में यही बताया जाता है कि ईश्वर तो सबसे अधिक दयालु हैं और सबसे अधिक समझदार भी हैं। उनसे अधिक दयावान और समझदार तो कोई हो ही नहीं सकता। तो फिर वो हम लोगों को सिर्फ इस कारण से नरक में कैसे डाल सकते हैं कि हम दूसरे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं? क्योंकि ईश्वर को विश्व में सबसे अधिक दयावान कहा जाता है, अगर उन्होंने इस प्रकार का कार्य किया तो इससे वो दयालू बिल्कुल नहीं कहलायेंगे। बल्कि ऐसा करने पर तो ईश्वर एक घमंडी राक्षस ‘हिरण्यकशिपु’ के समान कहलायेंगे। कोई मनुष्य भी इस प्रकार का कार्य करे, तो उसे अच्छा नहीं बल्कि बुरा व्यक्ति माना जायेगा। भगवान सिर्फ खुद की प्रशंसा में बोलने के लिए ही नहीं, वास्तव में भी परम दयालु और परम समझदार हैं। इसलिए सनातन धर्म का सिद्धांत समझाने वाली सर्वश्रेष्ठ पुस्तक ‘भगवद गीता’ के अध्याय 9 श्लोक 23 में कृष्ण कहते हैं कि “जो लोग दूसरे देवी-देवताओं की पूजा करते हैं, वो लोग भी एक प्रकार से मेरी ही पूजा करते हैं, पर वो लोग ऐसा अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं"। क्योंकि ठीक से देखा जाए तो भगवान कृष्ण ही असली परम ईश्वर है, और जब भी हम किसी एक ईश्वर की बात करते हैं तो कृष्ण ही संबोधित होते हैं। जब हम किसी सबसे अधिक दयावान व्यक्ति की बात करते हैं, या फिर जब हम सर्वशक्तिमान यानी सबसे अधिक शक्तिशाली और जो कुछ भी कर सकता है, ऐसे ईश्वर की बात करते हैं, तब नाम चाहे कुछ भी लें पर अप्रत्यक्ष रूप से तो भगवान कृष्ण का ही स्मरण होता है। इसके अलावा देवी-देवताओं को शक्ति तो कृष्ण से ही प्राप्त होती है, वहीँ देवताओं की पहचान भी सिर्फ अपनी शक्ति के कारण से ही होती है। तो इसलिए जब हम किसी दूसरे देवता की पूजा करते हैं, तब एक प्रकार से हम कृष्ण की ही पूजा करते हैं। क्योंकि दूसरे देवी-देवताओं के पास भी जो गुण, ऐश्वर्य, शक्ति और स्तुति हैं वो सब उन्होंने कृष्ण से ही प्राप्त किये हुए हैं। हालांकि ऐसा करना पूर्ण रूप से ठीक तो नहीं है, पर उतना अधिक गलत भी नहीं है जितना इस्लाम और दूसरे अब्राहमिक मज़हबों का पालन करने वाले लोग मानते हैं। वह अपनी इस मलीन मान्यता को सही साबित करने के लिए पूछते हैं कि “ईश्वर ये कैसे सहन करेंगे कि उनके स्थान पर हम किसी दूसरे व्यक्ति को ईश्वर मानने लगें? क्या आपके पिता ये सहन कर पाएंगे कि आप किसी दूसरे पुरुष को अपने पिता मानने लगो?” तो इसके जवाब में मैं यही कहती हूँ कि अवश्य नहीं, लेकिन मेरे पिता इतने क्रूर या राक्षस स्वभाव के नहीं हैं कि मेरी अज्ञानता और नादानी के लिए वो मुझे हमेशा के लिए नरक जैसे भयंकर स्थान में भेजकर दण्ड देंगे। उन लोगों तो ईश्वर को अकारण एक खलनायक समझ लिया है, जो अपनी प्रशंसा यानि तारीफ और पूजा करवाने के लिए हद से अधिक उतावला हो चूका है। जबकि असल में ईश्वर ऐसे बिलकुल भी नहीं हैं। इस्लाम के अनुसार तो जो सिर्फ और सिर्फ अल्लाह को ईश्वर और इस्लाम को पेश करने वाले ‘मुहम्मद साहब’ को अंतिम पैगम्बर नहीं मानता, वो मनुष्य जहन्नुम में जाता है। जहन्नुम में उसे बहुत कड़ा दण्ड मिलेगा। आग में डाल दिया जाएगा, पहाड़ो से फैंका जाएगा, उबलता हुआ पानी-पिलाया जाएगा। ऐसे ही बहुत कष्ट दिया जायेगा, और वो भी हमेशा बार-बार ऐसा होगा काफ़िर के साथ। काफ़िर उसे कहते हैं जो मनुष्य इस्लाम की मान्यता और नियमों का पालन नहीं करता। अगर एक बार को मैं ये मान भी लेती हूँ, कि सिर्फ इस कारण से कि मैंने इस्लाम मज़हब में सबसे पवित्र पुस्तक कही जाने वाली ‘क़ुरान’ में बताए अल्लाह को एक मात्र ईश्वर मानने से इंकार कर दिया और मुहम्मद साहब को अंतिम पैगम्बर मानने से इंकार कर दिया, और इस्लाम में बताये कुछ ऐसे नियम-कानून को मानने से इंकार कर दिया जो आज के ज़माने में मानने योग्य भी नहीं हैं, इसका इतना बुरा दण्ड होगा जो कोई कम बुद्धि वाला मनुष्य भी नहीं सोच सकता? तो फिर क्या इसका अर्थ ये नहीं हुआ कि इस्लाम के अनुसार ईश्वर एक घमंडी और गुस्सैल व्यक्ति हैं? और अगर ऐसा है तो क्या एक घमंडी, गुस्सैल व्यक्ति को ईश्वर मानना ठीक है? क्या उन्हें हमसे द्वेष यानि नफरत है? जबकि मेरे अनुसार तो इस प्रकार किसी से नफरत करने वाले भगवान के भक्त भी नहीं हो सकते, भगवान तो दूर की ही बात है। ऐसे विचार तो ‘हिरण्यकशिपु’ नामक एक राक्षस के थे। तो मुसलमानों! क्या आप अल्लाह की तुलना हिरण्यकशिपु के साथ करना चाहते हो? कृप्या अल्लाह या ईश्वर को एक राक्षस स्वभाव के जैसे मत समझो, वो तो परम दयालु हैं और उनके लिए पूरा विश्व एक जैसा है। विश्व के किसी भी जीव को जब दर्द होता है, तो सबसे अधिक कष्ट ईश्वर को होता है। और आप अज्ञानता से ये समझते हो कि, ईश्वर इतने क्रूर हैं कि सिर्फ किसी दूसरे की पूजा करने के कारण वो हमें हमेशा के लिए नरक में इतने भयंकर दण्ड देंगे। लेकिन अगर आप ये नहीं मानते कि अल्लाह या ईश्वर क्रूर और घमंडी हैं, तो ये बहुत अच्छी बात है। पर ऐसा भी तो नहीं हो सकता कि एक ओर आप अपना क्रूर व्यवहार दिखाओ और दूसरी ओर आप खुद को सबसे अधिक दया वाला बताओ। कोई घमंड दिखाकर और क्रूरता करके दयालु कैसे हो सकता है? क्या आपके अनुसार ईश्वर सिर्फ बोलने के लिए ही दयालु है? क्या ये इस प्रकार से है जैसे किसी खलनायक के द्वारा, लोगों को डरा-धमका कर, दण्ड देकर खुद को ईश्वर और दयालु कहलवाने का प्रयास हो रहा है? और साथ ही इसमें भोग-ऐश्वर्य के लालच का भी सहारा लिया जा रहा है? ये कोई दावा नहीं सिर्फ सामान्य से प्रश्न हैं, जिनका सटीक उत्तर किसी के पास नहीं।